*छत्तीसगढ़ शिक्षक भर्ती पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, आरक्षण रोस्टर को लेकर उठे सवाल*
*छत्तीसगढ़ शिक्षक भर्ती पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, आरक्षण रोस्टर को लेकर उठे सवाल* *भर्ती प्रक्रिया पर कोर्ट की अहम टिप्पणी, पहले से नियुक्त शिक्षकों को हटाने का नहीं दिया आदेश*
*छत्तीसगढ़ शिक्षक भर्ती पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, आरक्षण रोस्टर को लेकर उठे सवाल*
*भर्ती प्रक्रिया पर कोर्ट की अहम टिप्पणी, पहले से नियुक्त शिक्षकों को हटाने का नहीं दिया आदेश*
लोक सीजी न्यूज/बिलासपुर, 14 अक्टूबर:- छत्तीसगढ़ में शिक्षक भर्ती के दौरान आरक्षण रोस्टर लागू करने को लेकर चल रहे विवाद पर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि विवादित आरक्षण व्यवस्था को निरस्त करने का मतलब पहले से नियुक्त शिक्षकों को तत्काल सेवा से हटाना नहीं है। हालांकि, वर्तमान और भविष्य की नियुक्तियों के साथ पदोन्नति से जुड़े मामलों को सुप्रीम कोर्ट में लंबित विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) के अंतिम निर्णय के अधीन रखने की बात कही गई है।
58 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था पर उठा था विवाद
यह पूरा मामला छत्तीसगढ़ सरकार की 29 नवंबर 2012 की अधिसूचना से जुड़ा है। इसके माध्यम से राज्य में कुल आरक्षण का अनुपात बढ़ाकर 58 प्रतिशत किया गया था। हाई कोर्ट ने 19 सितंबर 2022 को इस व्यवस्था को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया था। इसके बावजूद इसी नीति और उससे जुड़े रोस्टर के आधार पर नई भर्तियों में आरक्षण लागू किए जाने पर याचिकाकर्ताओं ने आपत्ति जताई।
शिक्षक भर्ती के रोस्टर को दी गई चुनौती
स्कूल शिक्षा विभाग और व्यापमं ने 4 मई 2023 को सहायक शिक्षक, शिक्षक और व्याख्याता के रिक्त पदों पर सीधी भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। इस भर्ती प्रक्रिया में लागू आरक्षण रोस्टर को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नौशीना आफरीन अली सहित अन्य अधिवक्ताओं ने दलील दी कि शिक्षक ई-कैडर के 1,113 पदों में से 698 पद अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित किए गए थे। यह कुल पदों का लगभग 62.71 प्रतिशत था। इसी तरह टी-कैडर के 4,659 पदों में से 3,105 पद अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित किए जाने का दावा किया गया, जो लगभग 66.64 प्रतिशत बैठता है।
सहायक शिक्षक के पदों पर भी आरक्षण का अनुपात 56.62 प्रतिशत से 68.42 प्रतिशत तक होने की बात कही गई। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इस प्रकार की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित समानता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
नियुक्त शिक्षकों को राहत, लेकिन आगे की प्रक्रिया पर नजर
अदालत के फैसले का अहम पहलू यह है कि विवादित आरक्षण व्यवस्था को निरस्त करने के बावजूद पहले से नियुक्त शिक्षकों को तत्काल सेवा से हटाने का निर्देश नहीं दिया गया है। वहीं, वर्तमान और भविष्य की नियुक्तियों तथा पदोन्नतियों से जुड़े मामलों को सुप्रीम कोर्ट में लंबित SLP के अंतिम फैसले के अधीन रखने की बात कही गई है।
इस फैसले से शिक्षक भर्ती से जुड़े विवाद में प्रशासनिक निरंतरता और आरक्षण की संवैधानिक वैधता के सवाल अलग-अलग हो गए हैं। हालांकि, भर्ती प्रक्रिया और आरक्षण रोस्टर को लेकर अंतिम स्थिति समझने के लिए हाई कोर्ट के आदेश की पूरी प्रति और सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की अद्यतन स्थिति देखना जरूरी होगा।