*हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक है जशपुर स्थित बाबा मलंग शाह का मजार* * शुरू हुआ जशपुर का सालाना उर्स, दो रात सजेगी कव्वाली की महफिल*
*हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक है जशपुर स्थित बाबा मलंग शाह का मजार* * शुरू हुआ जशपुर का सालाना उर्स, दो रात सजेगी कव्वाली की महफिल*
*हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक है जशपुर स्थित बाबा मलंग शाह का मजार*
* शुरू हुआ जशपुर का सालाना उर्स, दो रात सजेगी कव्वाली की महफिल*
लोक सीजी न्यूज / जशपुरनगर 1 जून 2026. हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक जशपुर स्थित बाबा मलंग शाह का दो दिवसीय सालाना उर्स आज सोमवार 1 जून से शुरू हो गया। आयोजन समिति के सदर महबूब अंसारी और सेकरेट्री सरफराज आलम ने बताया कि उर्स का शुभारम्भ सोमवार 1 जून को मजार में कुरआन खानी के साथ होगा। इसी दिन नमाजे जोहर संदल व ग़ुस्ल के बाद शाम 4 बजे चादरपोशी की गई। मंगलवार 2 जून को कुरआन खानी और फातेहा ख्वानी का कार्यक्रम सम्पन्न होगा।
जशपुर स्थित बाबा मलंग शाह रह. की मजार पर हर साल की तरह उर्स के अवसर पर दोनो रातों को कव्वाली मुकाबला का आयोजन किया गया है। उर्स आयोजन समिति के महबूब अंसारी और सेकरेट्री सरफराज आलम, इमरान आलम ने बताया कि, जशपुर का कव्वाली हर वर्ष देश के विख्यात कव्वालों के कार्यक्रम के लिए प्रसिद्ध है। इस वर्ष भी देश के जाने-माने कव्वाल गुलाम हबीब पेंटर गोरखपुर उत्तर प्रदेश और आगरा उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध कव्वाला गुलनाज साबरी के बीच कव्वाली का शानदार मुकाबला देखने और सुनने का श्रोताओं को मौका मिलेगा।
*जशपुर राज परिवार से जुड़ा है बाबा के जशपुर आने का इतिहास*
जशपुर स्थित बाबा मलंग शाह के मजार का बरसों से सेवा कर रहे मोहम्मद इस्माइल ने बताया कि रिसायत के अंतिम राजा विजय भूषण सिंह देव के द्वारा कही कहानी उन्हें याद है। मो इस्माईल ने बताया कि जिस समय जशपुर रियासत के राजा विशुन देव सिंह के समय अपने दो हाथियों और चार शागिर्दों के साथ बाबा जशपुर आए थे। घोड़ों का व्यापार करते थे लेकिन जशपुर सहित आसपास के लोग उनके पास समस्या लेकर आते थे। उन्होंने बताया कि एक बार राजा विशुन देव उनकी ख्याति सुनकर स्वयं अपनी समस्या लेकर यहां पैदल आए और उनकी चार समस्याओं का समाधान हो जाने पर उन्होंने हर संसाधन यहां जुटाए। उन्होंने बताया कि जशपुर में बाबा मलंगशाह करीब 20 साल तक रहे और जशपुर क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाकर सामाजिक सौहाद्र्र की मिसाल छोड़ गए। जिसके लिए वे आज भी याद किए जाते हैं।
बाबा मलंग शाह ने जिस भूमि का चयन किया था, वहां उन्होंने करबला का निर्माण कराया। लंबे समय तक रहने के बाद, बाबा के परदा फरमाने याने निधन के बाद उसी भूमि पर उनकी मजार बनाई गई, जो बाबा मलंगशाह के मजार शरीफ के नाम से दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।
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